From Wikipedia_hi - Reading time: 1 min| इस लेख में भ्रामक शब्दों का प्रयोग है, जो आम तौर पर ऐसा कथनों में प्रयोग होते हैं जो या तो पक्ष लेते हैं या सत्यापित नहीं किये जा सकते। ऐसे कथनों का स्पष्टीकरण किया जाना चाहिये अथवा उन्हें हटाया जाना चाहिये। (फ़रवरी 2015) |
| इस लेख में सन्दर्भ या स्रोत नहीं दिया गया है। कृपया विश्वसनीय सन्दर्भ या स्रोत जोड़कर इस लेख में सुधार करें। स्रोतहीन सामग्री ज्ञानकोश के उपयुक्त नहीं है। इसे हटाया जा सकता है। (फ़रवरी 2015) स्रोत खोजें: "गुरु घासीदास" – समाचार · अखबार पुरालेख · किताबें · विद्वान · जेस्टोर (JSTOR) |
| गुरु घासीदास | |
|---|---|
|
| |
| जन्म |
18 दिसम्बर 1756 गिरौदपुरी, छत्तीसगढ़, भारत |
| मौत |
अज्ञात |
| कार्यकाल | 1756-1850 |
| उत्तराधिकारी | गुरु बालकदास |
| धर्म | सतनामी |
| जीवनसाथी | सफुरा माता |
| बच्चे |
सहोद्रा माता, गुरु अमरदास, गुरु बालकदास |
| माता-पिता | महगूंदास, माता अमरौतिन |
गुरू घासीदास (1756 – अंतर्ध्यान अज्ञात) छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले के गिरौदपुरी गांव में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ अवतरित हुये थे गुरू घासीदास जी सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी समाज कहा जाता है, के प्रवर्तक थे। गुरूजी ने भंडारपुरी में जहाँ अपने धार्मिक स्थल को संत समाज को प्रमाणित सत्य के शक्ति के साथ दिया था, वहाँ गुरूजी के वंशज आज भी निवासरत है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिवाद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। इनसे समाज के लोग बहुत ही प्रभावित थे।
सन १६७२ में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सतनामी साध मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत को मानते थे। वे सम्मान करते थे लेकिन किसी के सामने झुक कर नहीं। एक बार एक किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी साध ने भी उस कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकडते गया और धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात भी फैल गई कि सतनामी समूह कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फरक नहीं पड़ा था। लेकिन उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आध्यात्मिक शक्ती के कारण यह स्थिति थी। चूंकि सतनामी साधों का तप का समय पूरा हो गया था उनमे अद्भुत ताकत और वे गुरू के समक्ष अपना समर्पण कर वीरगति को प्राप्त हुए। बचे हुए सतनामी सैनिक पंजाब,मध्य प्रदेश कि ओर चले गये। छत्तीसगढ़ मे संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार तथा प्रसार किया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में बलौदा बाजार जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में पैदा हुए थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर कुठाराघात किया। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाया जाता है।
गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।
गुरु घासीदास ने सतनाम धर्म की स्थापना की और सतनाम धर्म की सात सिद्धांत दिए।
सतनामी समाज १९५० के बाद से आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े होने के कारण अनुसुचित जाति मे शामिल कर लिया गया
गुरु घासीदास बाबा जी के शिक्षा दीक्षा के संबंध में जितने भी जानकारियां दी जाती है वे सब भ्रामक है उन्होंने किसी से भी शिक्षा प्राप्त नहीं किया और न ही उनके कोई गुरु थे बाबा घासीदास स्वयं महाज्ञानी थे।
गुरू घासीदास बाबाजी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।
गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।
सत्गुरू घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं-
(१) सतनाम् पर विश्वास रखना।
(२) जीव हत्या नहीं करना।
(३) मांसाहार नहीं करना।
(४) चोरी, जुआ से दूर रहना।
(५) नशा सेवन नहीं करना।
(६) जाति-पाति के प्रपंच में नहीं पड़ना।
(७) व्यभिचार नहीं करना।
छत्तीसगढ़ के किसान मुख्य रूप से कृषि कार्य पर आश्रित थे उनके आजीविका का एक मात्र साधन जमीन और उससे जुड़े कार्य थे। राजस्व व्यवस्था किसानों के द्वारा देय कर पर निर्भर था। छत्तीसगढ़ में सन् 1787 से लेकर 1818 तक सूबेदारी प्रथा प्रचलन में थी । जिसके अंतर्गत किसानों के उपर बहुत से कर लाद दिया गया था । सन् 1803 में अंग्रेजों और मराठाओं के बीच हुए युद्ध के क्षतिपूर्ति के लिए राजस्व कर में और वृद्धि किया गया । सन् 1817 में पूना में अंग्रेजों ने पेशवा को संधि के लिए विवश किया फलस्वरूप छत्तीसगढ़ का संचालन ब्रिटिश रेजिमेंट के जरिए होने लगा । पश्चात सन् 1818 के दूसरे युद्ध में अंग्रेजो ने अप्पा साहब को परास्त कर 15 मार्च 1818 को गिरफ्तार कर लिया और रघूजी तृतीय को अवयस्क होने के कारण गद्दी पर बैठाकर चालाकी से उनके संरक्षक बनकर राज्य का अधिकार अपने हाथों में ले लिया । नागपुर में प्रथम अंग्रेज रेजिडेंट जेनकिंस को नियुक्त किया गया । कैप्टन एडमंड छत्तीसगढ़ के प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक रहे। जिनका शासन कुछ माह तक ही रहा इनके समय में अप्पा साहब की प्रेरणा से डोंगरगढ़ के जमींदार ने 1818 में अंग्रेजी शासन के विरुध्द विद्रोह किया था परन्तु उसे दबा दिया गया। इस घटना के कुछ दिन पश्चात ही एडमण्ड की मृत्यु हो गई ।कैप्टन एडमंड के बाद मि. एगेन्यु छत्तीसगढ़ के अधीक्षक बने इन्होने सन् 1818 में रतनपुर से रायपुर राजधानी परिवर्तन किया । सन् 1818 से 1824 तक छत्तीसगढ़ में सेवा करने के पश्चात अपना त्यागपत्र दे दिया ।तीसरे अधीक्षक कैप्टन हंटर ने कुछ माह तक शासन किया। इसके पश्चात कैप्टन सैंडिस चौथे अधीक्षक के रूप में नियुक्त हुए जिन्होंने सन् 1825 से 1828 तक सेवा दिया।।
तब अंग्रेजों ने भी अधिक से अधिक राजस्व वसूली के लिए कृषि पर निर्भरता को प्रदर्शित किया जिसके पुर्ति के लिए कैप्टन एगेन्यू ने सुबेदारी प्रथा को समाप्त करके सन् 1820 में गौंटिया शासन को महत्व दिया जिससे राज्स्व का भूगतान सीधे मालगुजार और गौंटिया के मार्फत होने लगा।
अंग्रेजों के इस नवीन भूमि राजस्व नीति का उद्देश्य केवल कर वसुलना ही नहीं अपितु उत्पादन और राज्स्व कर में नियमित और क्रमिक विकास करना था ताकि शांतिपूर्ण ढंग से आमदनी होती रहे ।
मालगूजारी व्यवस्था में बहुतायत में किसान मालगूजारो पर निर्भर होने लगे । इसने मालगूजारो के हैसियत में वृद्धि किया और वे किसानों तथा भूमि के स्वामी बन गए । बीज बोवाई के लिए , तथा कृषि कार्य के लिए और अन्य सभी सहायता जो वे किसानों को उपलब्ध कराते थे उसमें मालगूजारो की मनमानी चलने लगी । वे किसानों को बकाया कर के लिए उधार देते और नहीं चुकाने की स्थिति में उन्हें उनके जमीन से बेदखल कर देते । गौंटिया जानबूझकर राज्स्व देने में देरी करते ताकि किसान अपने उपज को बेचकर ऋण चुकता करे अथवा उधारी बाढी लेकर भरण पोषण के लिए विवश हो जाए ।
किसान #मालिकाना पटाने के लिए बाध्य थे। मालिकाना वह राशि थी जो किसान अपनी जमीन पर कब्जा के एवज में चुकाया करते थे । जमीनदार को यह हक था कि यदि कोई किसान मालिकाना न पटाते तो वह उसकी संपत्ति के विक्रय या हस्तांतरण पर रोक लगा दे । यह अधिकार सन् 1898 के एक्ट पारित होने तक बना रहा ।
Malikana is a fee paid to a landlord to occupy his lands .( रायपुर सेटलमेंट रिपोर्ट 1912)
किसानों को एक अन्य कर देना होता था जिसका नाम है #नजराना । जब कोई मालगुजार किसी व्यक्ति के जमीन सुपुर्दगी के बाद उस ज़मीन को दुबारा पून: आबंटित करना चाहे तब जो किसान उसे लेना चाहते थे उन्हें किस्त के रुप में विशेषाधिकार के लिए नगद के रूप में रूपये चुकाने होते थे जिससे उसे कृषि करने का अधिकार अथवा आश्वासन प्राप्त हो सके ।
A nazrana is a gift or present ; a fee paid as on acknowledgement for a grant of land .(नागपुर सेटलमेंट रिपोर्ट 1919)
नजराना और मालिकाना दो ऐसे स्त्रोत है जिनके माध्यम से मालगुजार राज्स्व में हेर फेर किये बिना आमदनी प्राप्त करते थे । इसके अलावा अंग्रेज अधिकारी ने अन्य स्रोत का भी उल्लेख किया है जिनसे मालगुजार आमदनी प्राप्त करते थे , जो निम्नलिखित हैं :-
1 बटाई अथवा तौकिस्म - यह कूल उपज में से एक चौथाई हिस्सा था जो मालगुजार वसूलते थे । 2 रेघा किराया- किसानों को रेघा देने के बाद मिलने वाली आय 3 सीर sir - बाढी पर मिलने वाले अतिरिक्त धन ब्याज 4 भाग - उपज का दसवा या चौथाई हिस्सा 5 बेगार- मालगुजार को अधिकार था कि वे अपने अधीनस्थों से बैठ बेगारी करवा सके बेगार के एवज में मजदूरो को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता था बल्कि निशुल्क सेवा कार्य लिया जाता था ।
मराठा और अंग्रेजों के संयुक्त औपनिवेशिक शासनकाल में इसके अलावा और कुछ प्रशासनिक कर किसानों और मजदूरों को चुकाने होते थे जो निम्नलिखित हैं:-
1. कृषि से असंबद्ध शुद्रो पर मराठा शासन ने पंडरी कर लगाया था. [जेंकिन्स 14] 2. गुनहगारी कर: यह कर परस्त्री गमन तथा कुमारीगमन पर दंड कर के रूप में सुबेदारी प्रशासन ने लगाया था. इस कर के माध्यम से मराठा शासन को प्रतिवर्ष ₹25000 की आय होती थी. इन करो को कमाविसदार इकट्ठा करते थे.[एग्न्यू 1820] 3. चूड़ी पहरावन: विधवा के पुनर्विवाह पर लगने वाला कर. [एग्न्यू 1820] 4. सावन: पुनर्विवाह के बिना विधवा को अपने माता-पिता के घर में रहने की अनुमति का कर.[एग्न्यू 1820] 5. पैठू: विवाह टूट जाने पर या स्वैच्छा से किसी की रखैल बन जाने पर कर. [एग्न्यू 1820] 6. भात खवाई: जाति बहिष्कृत लोगों को पुनः जाति के अंतर्गत मिलाए जाने पर कर [एग्न्यू 1820] 7. चौथी: अनधिकृत रूप से अर्जित संपत्ति का एक चौथाई भाग राजसात करना. [एग्न्यू 1820] 8. घाटगारा: नदी पार करने पर लिया जाने वाला कर. [एग्न्यू 1820] 9. जद्दीद टीका: गांव के पटेल या गौंटिया बनने पर सरकार को दिया जाने वाला नजराना. [एग्न्यू1820] 10. जुआ: जुआ खेलने वालों से प्रति व्यक्ति ₹1 का कर. [एग्न्यू 1820] 11. कुर्की: सरकार से अपने अनुकूल न्याय पाने के लिए इच्छुक लोगों से लिया जाने वाला कर. [एग्न्यू 1820]
इसके अलावा और भी राज्स्व थे जो आम जनता से वसूली जाती थी जैसे :-
1टिकोली - जमींदारों को दी जाने वाली निश्चित राशि थी 2 सादर- आयात निर्यात पर लगाया गया कर था 3 कलाली- जो मादक पदार्थों पर लगाया जाने वाला आबकारी कर था । 4 सेव ई - छोटे बड़े उत्पादों पर लगाया गया कर था। जो अस्थाई करो का सम्मिलित रूप था । 5 जमींदारी टैक्स- आयातीत अनाज पर लगाया जाता था।
राजा गुरु बालकदास जी ने अनेकों गांवों में कर निषेध अभियान का आगाज किया और ब्रिटिश तथा मराठाओं को राजस्व देने से मना किया ।
राजा गुरु बालकदास जी के शासन क्षेत्र में आने वाले गांवों में तेलासी, भंडार, चोरभठ्ठी, खपरी, भैंसा, कोडापार, सुद्री, बरडीह, खडुआ, बोरसरा, जोरापार, गैतरा, दुलदुला, सिमगा, तरेंगा, मारो , चकरवाय, गुढियारी, बिल्हा, कोसा, धौराभाठा, बरतोरी, खुडियाडीह, कनेरी, दुरगाडीह, बिरैंया, नंगाराडीह, मंगरउसला, पथहा, कुआं, झाल, बुदेला और कुटेला गांव सम्मिलित थे । इसके अलावा नवागढ़, रायपुर , बिलासपुर एवं दुर्ग जिले के सतनामी बाहुल्य गांव के लोगों ने राजा गुरु बालकदास जी के नेतृत्व में प्रत्यक्ष रूप से कर देना बंद कर दिया । सतनामी बड़े दबंगई के साथ अन्यायी और अत्याचारी गौंटिया मालगुजार और सामंतों का विरोध करते थे । वे हजारों के तदाद में इकठ्ठा होकर योजनाबद्ध तरीके से अचानक हमला करते थे और जमीन जायदाद से जुड़े कागजात छिन लेते थे और उन्हें रद्दी की तरह जला देते थे । हालांकि गुरु घासीदास जी का सतनाम आंदोलन जो वास्तव में एक विशुद्ध धार्मिक एवं समाजिक सूधार की अवस्था थी जो पूर्णतः अहिंसात्मक और सत्याग्रह पर आधारित था । परन्तु राजा गुरु बालकदास जी के नेतृत्व में उठ खड़ा हुआ यह सतनामी विद्रोह जो कि किसानों और भुमिहीनो का विद्रोह था काफी आक्रमक और उत्तेजित था। राजा गुरु बालकदास जी ने लोगों को ललकारा की जे हाथ नांगर अउ हसिया धरके धरती के सेवा कर सकथे तेन अपन हक अउ स्वाभिमान बर हथियार घलो उठा सकथे। उन्होंने परदेशिया ताकत के विरोध में छत्तीसगढ़ के निवासियों में शोषण और अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार और निडरता की भावना का संचार किया। राजा गुरु बालकदास जी के नेतृत्व में सतनामी एक शक्ति के रूप में उभरा और गजब के संगठन शक्ति का परिचय दिया । राजा गुरु बालकदास जी ने कहा जिस प्रकार हाथ की उंगलियां अकेले भोजन का निवाला बनाकर नहीं खा सकती जबकि वहीं उंगलियां संगठित हो जाए तो अपने साथ दूसरों का पेट भी भर सकती है । यदि छत्तीसगढ़ के निवासी संगठित हो जाए , हमारे किसान और मजदूर संगठित हो जाए तो बड़े से बड़े आतातायी का मुंह मोड़ जवाब उनके घर में घुसकर दिया जा सकता है। राजा गुरु बालकदास जी गांव गांव घुमकर सन् 1820 से 1830 तक लोगों को संगठित किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि छत्तीसगढ़ के लाखों सतनामी और अन्य समुदाय के लोग श्वेत ध्वज के नीचे संगठित हुए। यद्यपि श्वेत ध्वज शांति का प्रतीक था तथापि राजा गुरु बालकदास जी ने अपने सुझबुझ और रणनीति से उसे #क्रांति_ध्वज के रूप में परिवर्तित कर दिया । और छत्तीसगढ़ के किसान और भुमिहीन अन्याय के खिलाफ अपने भूमि पर स्वामित्व के लिए लड़ने लगे।
उपरोक्त सतनामी विद्रोह का वर्णन करते हुए रायपुर के सेटलमेंट आफिसर जे एफ हैविट रायपुर गजेटियर 1869 के पृष्ठ 33 में लिखते हैं कि
the Satnami ryots are a power in the land ; as a class they always act together , and are persistent assertors of their rights , real and fanciel , and a terror to encroaching malgoozars , few being found bold enough to stand up against the resistance of Satnami ryots to unpopular measures .
गुरु घासीदास के निर्देशन और आशीर्वाद से संचालित यह सतनामी विद्रोह इतना शक्तिशाली था कि अंग्रेजों को सन् 1830 में राज्य शासन के सत्ता से हटना पड़ा यद्यपि केन्द्र में ब्रिटिशों का नियंत्रण बना रहा । 27-12-1829 को अंग्रेजो और भोंसलों के बीच में एक नवीन संधि हुई जिसके अंतर्गत छत्तीसगढ का शासन पुनः मराठो को दे दिया गया । सत्ता का यह हस्तान्तरण 06-01-1830 को संपन्न हुआ। और राज्यों में जिलेदार की न्युक्ति हुए । ब्रिटिश अधीक्षक क्राफर्ड ने भोंसले शासक कृष्णराव अप्पा को छत्तीगसढ़ का शासन सौपा। इस दौरान 12 वर्षो तक छत्तीसगढ़ ब्रिटिश नियंत्रण में रहा ।
तथापि राजा गुरु बालकदास जी के नेतृत्व में सतनामी विद्रोह ने सन् 1832 में प्रचंड रूप धारण किया उनके नेतृत्व में सतनामियो ने मराठा सामंतियो से बलपूर्वक 362 गांव की मालगूजारी हड़प लिया , तथा भोंसला सरकार द्वारा जारी आदेश पत्रों को जलाकर राख कर दिया गया । किसानों के ऋण पुस्तिका को साहूकारों और अधिकारियों से छीन लिए गए और सभी कागजात नष्ट कर दिये । इस प्रकार उन्होंने न केवल सबूतों को मिटाया बल्कि स्वयं को भूस्वामी अथवा मालगुजार के रूप में स्थापित कर लिया। इसका जिक्र सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर 1870 में चार्ल्स ग्रांट इस प्रकार करते हैं :-
Satnamis liberated three hundred and sixty two villages of zamindaris and become zamindars of this villages which were seized forcibly and illegally by Maratha jamidars . The revolutionary seized all 'the paper relating to the land and brunt . The current revolution were aimed at the debentures of the formers should be seized from the officials and the money lenders they not only turn off and burnt the documents and papers of the properties but also they became zamindars of that villages.
भारतीय इतिहास का यह स्याह पक्ष है कि राजा गुरु बालकदास जी के नेतृत्व में हुए इस किसानों के सतनामी विद्रोह का कभी कोई जिक्र ही नहीं किया गया। भारतीय इतिहास में जिन्होंने अपनी राज्य के सीमा विस्तार के लिए असंख्य निर्दोषों के रक्त बहाया उन्हें सम्राट लिखा गया, जिन्होंने केवल अपनी राजसत्ता के लिए खूनी लड़ाईयां लडी उन्हें वीर कहा गया लेकिन जिन संतों ने मानवीय समानता के लिए आवाज उठाई तथा जिन महापुरूषों ने मातृभूमि के रक्षा के लिए एवं जनता जनार्दन के आत्मसम्मान और अस्मिता के लिए तलवार उठाई अपने प्राणों की आहुति दिये ऐसे जबाज योद्धाओं को विस्मृत कर दिया गया। ऐसे वीर पात्रों के लिए जिन्होंने सोये हुए जनता में देशभक्ति और प्रतिकार के स्वर को मुखरित किया , निर्बल समझे जाने वाले भुजाओं में अश्वों का बल भरा , अवरुद्ध कंठो में सिंघो सा भयंकर दहाड़ उत्पन्न किया उनके बारे में लिखते समय इतिहासकारों के कलम टूट गये , साहित्य साधकों के छंद बद्ध हो गये उनके बारे में बताने के लिए मिडीया मौन हो गई और छत्तीसगढ़ की सरकार चीर निद्रा में सो गया।
आज समय है मुक्त कंठो में अवरूद्ध कपाटों को खोलने का , गौरवशाली इतिहास पर वर्षों से जमें धुल को हटाने का और मिडीया तथा फिल्म जगत के माध्यम से उनके शौर्य और वीरगाथा को बताने का कि :- कैसे उन्होंने छत्तीसगढ़ के धरती से पिंडारियो को मार भगाया ? कैसे उन्होंने अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर किया ? किस तरह से उन्होंने अभिमानी और क्रूर सामंतियो के विषफन को कूचला और कैसे देशी स्वशासन की नीव डाली🏳️ सतनाम 🏳️ नरेंद्र भारती सतनामी✍️✍️✍️[13/6/2022]