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काव्य से रस किस प्रकार उत्पन्न होता है, यह काव्यशास्त्र का शाश्वत प्रश्न रहा है। संस्कृत काव्यशास्त्र के आद्याचार्य भरत मुनि ने अपने विख्यात रससूत्र में रस निष्पत्ति पर विचार करते हुए लिखा-
विभावानुभाव-व्यभिचारी-संयोगाद् रसनिष्पत्तिः।—भरत मुनि, नाट्यशास्त्र
अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। विभाव अनुभाव और संचारी भाव तो स्पष्ट था किंतु संयोग और निष्पत्ति के अर्थ को लेकर परवर्ती आचार्यों ने अनेक मत प्रकट किए। इनमें चार मत उल्लेखनीय हैं-